Course Code: BPSC-101, Course Name: राजनीतिक सिद्धांत की समझ

PDF में दिए गए सभी प्रश्न नीचे उसी क्रम में टाइप करके लिख रहा हूँ।

Course Code: BPSC-101
Course Name: राजनीतिक सिद्धांत की समझ
Assignment Code: BPSC-101/ASST/TMA/2025-26
अधिकतम अंक: 100

इस असाइनमेंट के तीन भाग हैं। आपको तीनों भागों के सभी प्रश्नों के उत्तर देने हैं।


असाइनमेंट – I

निम्न वर्णनात्मक श्रेणी के प्रश्नों के उत्तर लगभग 500 शब्दों (प्रत्येक) में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 20 अंकों का है।

1. राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुद्धार की चर्चा कीजिए। (20)

2. राज्य पर राल्फ मिलिबैंड के विचारों की व्याख्या कीजिए। (20)


असाइनमेंट – II

निम्न मध्यम श्रेणी के प्रश्नों के उत्तर लगभग 250 शब्दों (प्रत्येक) में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

1. आधुनिक उदारवाद/कल्याणवाद पर एक लेख लिखिए। (10)

2. ऐतिहासिक भौतिकवाद का विस्तृत वर्णन कीजिए। (10)

3. रूढ़िवाद की व्याख्या कीजिए। (10)


असाइनमेंट – III

निम्न लघु श्रेणी के प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 शब्दों (प्रत्येक) में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 6 अंकों का है।

1. पर्यावरणीय नारीवाद पर एक लेख लिखिए। (6)

2. विखंडन क्या है? व्याख्या कीजिए। (6)

3. लोकतंत्र के प्रकारों पर विस्तृत वर्णन कीजिए। (6)

4. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की जांच कीजिए। (6)

5. व्यवहार में प्रतिनिधिक लोकतंत्र की चर्चा कीजिए।

 

ASSIGNMENT 1 KA

प्रश्न 1. राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुद्धार की चर्चा कीजिए।
(लगभग 500 शब्द)

उत्तर

परिचय

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राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है। यह राज्य, सरकार, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, अधिकार, लोकतंत्र तथा नागरिकों के कर्तव्यों जैसे विषयों का अध्ययन करता है। एक समय ऐसा माना जाने लगा था कि राजनीतिक सिद्धांत का महत्व कम हो गया है, क्योंकि व्यवहारवाद (Behaviouralism) के प्रभाव से केवल तथ्यों और वैज्ञानिक शोध पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। लेकिन बाद में यह अनुभव हुआ कि केवल तथ्यों के आधार पर राजनीति को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसी कारण राजनीतिक सिद्धांत का पुनः विकास हुआ, जिसे राजनीतिक सिद्धांत का पुनरुद्धार कहा जाता है।

राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुद्धार के कारण

1. व्यवहारवाद की सीमाएँ

व्यवहारवाद ने राजनीति के अध्ययन को वैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया, लेकिन उसने न्याय, नैतिकता, समानता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों की उपेक्षा की। इससे राजनीतिक अध्ययन अधूरा रह गया।

2. सामाजिक और राजनीतिक समस्याएँ

गरीबी, बेरोज़गारी, युद्ध, आतंकवाद, पर्यावरण संकट, भ्रष्टाचार और मानवाधिकार जैसे प्रश्नों के समाधान के लिए केवल आँकड़े पर्याप्त नहीं थे। इनके लिए नैतिक और वैचारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस हुई।

3. मूल्यों का महत्व

राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज में न्याय और समानता स्थापित करने का भी साधन है। इसलिए राजनीतिक सिद्धांत में मूल्यों का महत्व फिर से स्वीकार किया गया।

4. उत्तर-व्यवहारवाद का उदय

1960 के दशक में उत्तर-व्यवहारवाद (Post-Behaviouralism) का विकास हुआ। इसके प्रमुख विचारक डेविड ईस्टन थे। उन्होंने कहा कि राजनीतिक अध्ययन केवल तथ्यों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान में भी उपयोगी होना चाहिए।

पुनरुद्धार की प्रमुख विशेषताएँ

  • राजनीतिक सिद्धांत में तथ्यों और मूल्यों दोनों को समान महत्व दिया गया।
  • न्याय, स्वतंत्रता, समानता और मानवाधिकार जैसे विषयों पर पुनः ध्यान दिया गया।
  • राजनीति को समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़कर देखा गया।
  • लोकतंत्र, नागरिक भागीदारी और उत्तरदायी शासन पर अधिक बल दिया गया।
  • विभिन्न विचारधाराओं का नए दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाने लगा।

राजनीतिक सिद्धांत का महत्व

राजनीतिक सिद्धांत नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करता है तथा सरकार और समाज के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने में सहायता करता है। साथ ही यह न्यायपूर्ण और उत्तरदायी शासन व्यवस्था के निर्माण में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

निष्कर्ष

अंततः कहा जा सकता है कि राजनीतिक सिद्धांत का पुनरुद्धार राजनीति विज्ञान के विकास की एक महत्वपूर्ण घटना है। इसने यह स्पष्ट किया कि राजनीति का अध्ययन केवल वैज्ञानिक तथ्यों तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि उसमें नैतिक मूल्यों, न्याय, समानता और मानव कल्याण को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। इसी कारण आज राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक विषय माना जाता है।

 

प्रश्न 2. राज्य पर राल्फ मिलिबैंड के विचारों की व्याख्या कीजिए।

(लगभग 500 शब्द)

उत्तर

परिचय

राल्फ मिलिबैंड (Ralph Miliband) 20वीं शताब्दी के प्रसिद्ध मार्क्सवादी राजनीतिक विचारक थे। उन्होंने राज्य, लोकतंत्र और पूंजीवाद के संबंधों का गहन अध्ययन किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “द स्टेट इन कैपिटलिस्ट सोसाइटी (The State in Capitalist Society)” में उन्होंने बताया कि पूंजीवादी समाज में राज्य पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता, बल्कि वह मुख्य रूप से पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करता है। मिलिबैंड ने राज्य को समाज की वर्गीय संरचना के संदर्भ में समझाने का प्रयास किया।

राल्फ मिलिबैंड के राज्य संबंधी विचार

1. राज्य वर्गीय संस्था है

मिलिबैंड के अनुसार राज्य एक वर्गीय संस्था है। पूंजीवादी व्यवस्था में राज्य का संचालन ऐसे लोगों के हाथों में होता है, जिनका संबंध संपन्न और प्रभावशाली वर्ग से होता है। इसलिए राज्य की नीतियाँ अक्सर उसी वर्ग के हितों के अनुरूप बनती हैं।

2. राज्य पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है

मिलिबैंड का मानना था कि राज्य स्वयं को सभी नागरिकों के हितों का रक्षक बताता है, लेकिन व्यवहार में वह पूंजीपति वर्ग के हितों की अधिक रक्षा करता है। सरकार की अनेक आर्थिक और औद्योगिक नीतियाँ बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक वर्ग को लाभ पहुँचाती हैं।

3. राज्य के प्रमुख संस्थानों की भूमिका

मिलिबैंड के अनुसार सरकार, नौकरशाही, न्यायपालिका, सेना और पुलिस जैसी राज्य की प्रमुख संस्थाओं पर प्रायः उच्च वर्ग का प्रभाव रहता है। इन संस्थाओं के उच्च पदों पर अक्सर वही लोग पहुँचते हैं जिनकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि संपन्न वर्ग से जुड़ी होती है।

4. लोकतंत्र की सीमाएँ

मिलिबैंड लोकतंत्र का विरोध नहीं करते थे, लेकिन उनका मानना था कि पूंजीवादी लोकतंत्र में चुनाव तो स्वतंत्र होते हैं, फिर भी आर्थिक शक्ति कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित रहती है। इसलिए वास्तविक समानता और सामाजिक न्याय प्राप्त नहीं हो पाता।

5. सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता

मिलिबैंड का विचार था कि समाज में वास्तविक समानता और न्याय स्थापित करने के लिए केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आर्थिक और सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन आवश्यक है, जिससे राज्य सभी वर्गों के हितों की समान रूप से रक्षा कर सके।

राल्फ मिलिबैंड के विचारों का महत्व

  • राज्य की वास्तविक भूमिका को समझने में सहायता मिलती है।
  • राजनीति और अर्थव्यवस्था के संबंधों को स्पष्ट किया।
  • सामाजिक न्याय और समानता के महत्व पर बल दिया।
  • लोकतंत्र की व्यावहारिक सीमाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया।
  • आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में मार्क्सवादी दृष्टिकोण को नई दिशा प्रदान की।

निष्कर्ष

अंत में कहा जा सकता है कि राल्फ मिलिबैंड ने राज्य को एक निष्पक्ष संस्था मानने के विचार को चुनौती दी। उनके अनुसार पूंजीवादी समाज में राज्य मुख्यतः पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करता है। उनके विचार आज भी राजनीति, लोकतंत्र, राज्य और सामाजिक न्याय के अध्ययन में महत्वपूर्ण माने जाते हैं तथा आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत को समझने में उपयोगी हैं।

ASSIGNMENT 2 KA प्रश्न 1. आधुनिक उदारवाद/कल्याणवाद पर एक लेख लिखिए।

(लगभग 250 शब्द)

उत्तर

परिचय

आधुनिक उदारवाद (Modern Liberalism) या कल्याणवाद (Welfare Liberalism) उदारवाद का विकसित रूप है। प्रारंभिक उदारवाद राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप का समर्थक था, जबकि आधुनिक उदारवाद मानता है कि केवल स्वतंत्रता देना पर्याप्त नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना भी राज्य का दायित्व है। इसी कारण इसे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी कहा जाता है।

आधुनिक उदारवाद की प्रमुख विशेषताएँ

  1. कल्याणकारी राज्य का समर्थन – राज्य नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है।
  2. समान अवसर – प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार और विकास के समान अवसर मिलना चाहिए, ताकि समाज में असमानता कम हो।
  3. सामाजिक न्याय – आधुनिक उदारवाद कमजोर एवं वंचित वर्गों के हितों की रक्षा तथा सामाजिक न्याय की स्थापना पर बल देता है।
  4. मिश्रित अर्थव्यवस्था – यह निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र दोनों के संतुलित विकास का समर्थन करता है।
  5. मौलिक अधिकारों की रक्षा – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, न्याय तथा मानवाधिकारों की सुरक्षा को आवश्यक माना जाता है।

महत्व

आधुनिक उदारवाद ने राज्य की भूमिका को केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनकल्याण का माध्यम बनाया। आज अनेक लोकतांत्रिक देशों में सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार योजनाओं और गरीबों के कल्याण के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाती हैं। इससे नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होता है और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनता है।

निष्कर्ष

अंततः कहा जा सकता है कि आधुनिक उदारवाद या कल्याणवाद ऐसी विचारधारा है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक कल्याण दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ प्रत्येक नागरिक को समान अवसर, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानपूर्ण जीवन प्राप्त हो सके। यही कारण है कि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को विशेष महत्व दिया जाता है।

प्रश्न 2. ऐतिहासिक भौतिकवाद का विस्तृत वर्णन कीजिए।

(लगभग 250 शब्द)

उत्तर

परिचय

ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार समाज का इतिहास मुख्य रूप से आर्थिक परिस्थितियों तथा उत्पादन के साधनों के विकास से निर्धारित होता है। मार्क्स का मानना था कि समाज में होने वाले राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का मूल आधार आर्थिक व्यवस्था होती है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद की प्रमुख विशेषताएँ

  1. आर्थिक आधार का महत्व – समाज की आर्थिक संरचना ही उसकी राजनीति, कानून, धर्म और संस्कृति को प्रभावित करती है।
  2. उत्पादन के साधन – भूमि, मशीन, कारखाने तथा प्राकृतिक संसाधन उत्पादन के प्रमुख साधन हैं। इन पर नियंत्रण रखने वाला वर्ग समाज में अधिक शक्तिशाली होता है।
  3. वर्ग संघर्ष – मार्क्स के अनुसार इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। शोषक और शोषित वर्गों के बीच संघर्ष के कारण समाज में परिवर्तन होता है।
  4. सामाजिक परिवर्तन – जब पुरानी आर्थिक व्यवस्था समाज की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाती, तब नई व्यवस्था का जन्म होता है। इसी प्रक्रिया से समाज निरंतर विकसित होता है।
  5. पूँजीवाद की आलोचना – मार्क्स ने कहा कि पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमिकों का शोषण होता है। इसलिए अंततः इस व्यवस्था का स्थान समाजवादी व्यवस्था लेगी।

महत्व

ऐतिहासिक भौतिकवाद समाज और इतिहास को समझने का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि आर्थिक शक्तियाँ समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस सिद्धांत का समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान और इतिहास के अध्ययन पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

निष्कर्ष

अंत में कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद समाज के विकास को आर्थिक आधार और वर्ग संघर्ष के माध्यम से समझाने वाला महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यद्यपि इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ भी की जाती हैं, फिर भी समाज और इतिहास के अध्ययन में इसका विशेष महत्व है।

 

प्रश्न 3. रूढ़िवाद की व्याख्या कीजिए।

(लगभग 250 शब्द)

उत्तर

परिचय

रूढ़िवाद (Conservatism) एक प्रमुख राजनीतिक विचारधारा है, जो परंपराओं, सामाजिक संस्थाओं, संस्कृति और स्थापित मूल्यों की रक्षा पर बल देती है। इस विचारधारा के अनुसार समाज में परिवर्तन आवश्यक हो सकता है, लेकिन वह धीरे-धीरे और सोच-समझकर होना चाहिए। रूढ़िवादी विचारक मानते हैं कि अचानक किए गए बड़े परिवर्तन समाज में अस्थिरता और अव्यवस्था पैदा कर सकते हैं।

रूढ़िवाद की प्रमुख विशेषताएँ

  1. परंपराओं का सम्मान – रूढ़िवाद समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों को महत्वपूर्ण मानता है तथा उनके संरक्षण का समर्थन करता है।
  2. क्रमिक परिवर्तन – यह विचारधारा क्रांतिकारी परिवर्तन का विरोध करती है और आवश्यक सुधारों को धीरे-धीरे लागू करने की पक्षधर है।
  3. सामाजिक व्यवस्था का समर्थन – रूढ़िवादी विचारक कानून, अनुशासन और सामाजिक स्थिरता को समाज के विकास के लिए आवश्यक मानते हैं।
  4. परिवार और धर्म का महत्व – परिवार, धर्म और सामाजिक संस्थाओं को समाज की 

    assignment 3प्रश्न 1. पर्यावरणीय नारीवाद पर एक लेख लिखिए।

    (लगभग 100 शब्द)

    उत्तर

    पर्यावरणीय नारीवाद (Ecofeminism) एक ऐसी विचारधारा है जो महिलाओं और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को स्पष्ट करती है। इसके अनुसार जिस प्रकार महिलाओं का शोषण और भेदभाव किया जाता है, उसी प्रकार प्रकृति का भी अत्यधिक दोहन और विनाश किया जाता है। पर्यावरणीय नारीवाद का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ पर्यावरण का संरक्षण करना है। यह प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग, जैव विविधता की रक्षा तथा सतत विकास पर बल देता है। इस विचारधारा के अनुसार महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से पर्यावरण संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसलिए पर्यावरणीय नारीवाद सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    आधारशिला माना जाता है तथा इनके संरक्षण पर बल दिया जाता है।

  5. निजी संपत्ति का समर्थन – रूढ़िवाद निजी संपत्ति के अधिकार का समर्थन करता है और इसे व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आर्थिक विकास के लिए आवश्यक मानता है।

महत्व

रूढ़िवाद समाज में स्थिरता, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सामाजिक संस्थाओं को मजबूत बनाने तथा समाज में संतुलित विकास को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।

निष्कर्ष

अंत में कहा जा सकता है कि रूढ़िवाद एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा है जो परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और क्रमिक सुधारों पर बल देती है। यद्यपि इसकी आलोचना परिवर्तन की गति को धीमा करने के लिए की जाती है, फिर भी सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक संरक्षण के कारण आधुनिक राजनीति में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

 

प्रश्न 2. विखंडन क्या है? व्याख्या कीजिए।

(लगभग 100 शब्द)

उत्तर

विखंडन (Deconstruction) एक आधुनिक दार्शनिक विचारधारा है, जिसका विकास फ्रांसीसी दार्शनिक जैक देरिदा (Jacques Derrida) ने किया। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी पाठ, विचार या अवधारणा का केवल एक निश्चित और अंतिम अर्थ नहीं होता, बल्कि उसके अनेक अर्थ हो सकते हैं। विखंडन का उद्देश्य किसी विचार या पाठ के छिपे हुए अर्थों और विरोधाभासों को उजागर करना है। यह स्थापित मान्यताओं और पारंपरिक धारणाओं पर प्रश्न उठाकर नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। राजनीति, साहित्य, समाजशास्त्र और दर्शन के अध्ययन में विखंडन का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह विचारों का गहराई से विश्लेषण करने में सहायता करता है।

 

प्रश्न 3. लोकतंत्र के प्रकारों पर विस्तृत वर्णन कीजिए।

(लगभग 100 शब्द)

उत्तर

लोकतंत्र वह शासन व्यवस्था है जिसमें जनता सर्वोच्च होती है और अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन चलाती है। लोकतंत्र के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं—

  1. प्रत्यक्ष लोकतंत्र – इसमें नागरिक स्वयं शासन संबंधी निर्णय लेते हैं। यह प्रणाली प्राचीन यूनान तथा वर्तमान में स्विट्जरलैंड के कुछ क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
  2. प्रतिनिधिक (अप्रत्यक्ष) लोकतंत्र – इसमें जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वे प्रतिनिधि शासन का संचालन करते हैं। भारत इसी प्रकार का लोकतांत्रिक देश है।

इन दोनों प्रकारों का उद्देश्य जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना, नागरिक अधिकारों की रक्षा करना तथा उत्तरदायी और जनहितकारी शासन की स्थापना करना है।

 

 

प्रश्न 4. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की जाँच कीजिए।

(लगभग 100 शब्द)

उत्तर

लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व (Representation) का अर्थ है कि जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करके उन्हें शासन चलाने का अधिकार देती है। ये प्रतिनिधि जनता की समस्याओं, आवश्यकताओं और हितों को संसद तथा विधानसभाओं में प्रस्तुत करते हैं। एक प्रभावी प्रतिनिधित्व प्रणाली में सभी वर्गों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों को उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। यदि प्रतिनिधि ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कार्य करें, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। इसलिए लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का उद्देश्य जनता की इच्छा के अनुसार शासन चलाना, जनहित की रक्षा करना तथा नागरिकों के अधिकारों और हितों को सुरक्षित रखना है।

 

प्रश्न 5. व्यवहार में प्रतिनिधिक लोकतंत्र की चर्चा कीजिए।

(लगभग 100 शब्द)

उत्तर

प्रतिनिधिक लोकतंत्र (Representative Democracy) वह शासन व्यवस्था है जिसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन नहीं करती, बल्कि चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है। ये प्रतिनिधि संसद, विधानसभा तथा अन्य संस्थाओं में जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके हितों के अनुसार नीतियाँ एवं कानून बनाते हैं। व्यवहार में प्रतिनिधिक लोकतंत्र का उद्देश्य उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी शासन स्थापित करना है। भारत, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश प्रतिनिधिक लोकतंत्र के प्रमुख उदाहरण हैं। इस व्यवस्था की सफलता निष्पक्ष चुनाव, जागरूक नागरिकों, ईमानदार प्रतिनिधियों तथा कानून के शासन पर निर्भर करती है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने में जनता की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।

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