BEVAE-181 (Environmental Studies) assignment

INDIRA GANDHI NATIONAL OPEN UNIVERSITY

ASSIGNMENT

Programme Name :
Bachelor of Arts (Honours) Political Science

Programme Code :
BAPSH

Course Code :
BEVAE181

Course Title :
Environmental Studies

Enrollment Number :
2604915006

Name :
CHANDAN KUMAR

Study Centre :
NALANDA COLLEGE (573)

Regional Centre :
PATNA

Session :
January 2026

Mobile Number :
_____________

Email :
_____________

Date :
_____________

Signature :
____________

 

INDIRA GANDHI NATIONAL OPEN UNIVERSITY

ASSIGNMENT

Programme Name : Bachelor of Arts (Honours) Political Science

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Programme Code : BAPSH

Course Code : BEVAE181

Course Title : Environmental Studies

Enrollment Number : 2604915006

Name : CHANDAN KUMAR

Study Centre : NALANDA COLLEGE (573)

Regional Centre : PATNA

Session : January 2026

Mobile Number : 98XXXXXXXX

Email : yourmail@gmail.com

Date : ___ / ___ / 2026

Signature : (अपने हस्ताक्षर)

Course Code : BEVAE-181

 

प्रश्न 1

प्रश्न:
“सतत विकास (Sustainable Development) के वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समाज को कुछ आवश्यक परिवर्तन करने होंगे।” इस कथन को लगभग 250 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

सतत विकास (Sustainable Deveopment) का अर्थ है ऐसा विकास जिससे वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी हों, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से कोई समझौता न करना पड़े। आज बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आवश्यक हैं।

सबसे पहले हमें प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। जल, वन, भूमि तथा खनिजों का अनावश्यक दोहन रोकना आवश्यक है। इसके साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा जैव ऊर्जा का अधिक उपयोग करना चाहिए ताकि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हो।

दूसरा, प्रदूषण नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना होगा। उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित पदार्थों का उचित उपचार किया जाए तथा प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाए। कचरे का पृथक्करण, पुनः उपयोग (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycle) को बढ़ावा देना चाहिए।

तीसरा, वनों और जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है। अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए तथा वन्य जीवों और उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा की जाए।

चौथा, समाज में पर्यावरण शिक्षा और जन-जागरूकता को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि प्रत्येक नागरिक पर्यावरण संरक्षण में अपनी जिम्मेदारी समझ सके।

अंत में, सरकार, उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों तथा आम नागरिकों को मिलकर कार्य करना होगा। सामूहिक प्रयास, पर्यावरण-अनुकूल तकनीक और जिम्मेदार जीवनशैली अपनाकर ही सतत विकास के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है।

निष्कर्ष

सतत विकास केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी है। यदि हम प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करें, प्रदूषण कम करें और पर्यावरण के प्रति जागरूक रहें, तो वर्तमान और भविष्य दोनों पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं स्वस्थ जीवन सुनिश्चित किया जा सकता है।


Q2 (a): प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession) एवं द्वितीयक अनुक्रमण (Secondary Succession) में अंतर उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर

प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession) द्वितीयक अनुक्रमण (Secondary Succession)
1. यह ऐसे स्थान पर शुरू होता है जहाँ पहले कोई जीव या वनस्पति नहीं होती। 1. यह ऐसे स्थान पर शुरू होता है जहाँ पहले जीवन मौजूद था, लेकिन किसी कारण से नष्ट हो गया।
2. इसमें मिट्टी का अभाव होता है। 2. इसमें मिट्टी पहले से मौजूद रहती है।
3. इसकी शुरुआत लाइकेन (Lichen) और काई (Moss) जैसे अग्रणी जीवों से होती है। 3. इसकी शुरुआत घास, झाड़ियों तथा छोटे पौधों से होती है।
4. यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। 4. यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज होती है।
5. उदाहरण: नई ज्वालामुखीय चट्टान या नया द्वीप। 5. उदाहरण: जंगल में आग लगने या बाढ़ के बाद पुनः वनस्पतियों का उगना।

सरल Diagram

प्राथमिक अनुक्रमण
नंगी चट्टान
     ↓
  लाइकेन
     ↓
   काई (Moss)
     ↓
   घास
     ↓
  झाड़ियाँ
     ↓
   वृक्ष

Q2 (b): जैव विविधता के प्रत्यक्ष (Direct) एवं अप्रत्यक्ष (Indirect) उपयोग मूल्य में अंतर उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर

प्रत्यक्ष उपयोग मूल्य (Direct Use Value) अप्रत्यक्ष उपयोग मूल्य (Indirect Use Value)
1. जिन संसाधनों का मनुष्य सीधे उपयोग करता है। 1. जिनसे मनुष्य को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलता है।
2. भोजन, लकड़ी, औषधि, फल आदि इसमें शामिल हैं। 2. जलवायु संतुलन, परागण, मृदा संरक्षण आदि इसमें शामिल हैं।
3. इनका आर्थिक मूल्य आसानी से ज्ञात किया जा सकता है। 3. इनका आर्थिक मूल्य सीधे निर्धारित करना कठिन होता है।
4. इनका उपयोग दैनिक जीवन में प्रत्यक्ष रूप से होता है। 4. ये पर्यावरण को संतुलित रखने में सहायता करते हैं।
5. उदाहरण: लकड़ी, शहद, मछली, औषधीय पौधे। 5. उदाहरण: मधुमक्खियों द्वारा परागण, वनों द्वारा ऑक्सीजन प्रदान करना और बाढ़ नियंत्रण।

सरल Diagram

              जैव विविधता
                    │
        ┌───────────┴───────────┐
        │                       │
प्रत्यक्ष उपयोग             अप्रत्यक्ष उपयोग
        │                       │
भोजन, लकड़ी,             परागण, जलवायु
औषधि, मछली              संतुलन, मृदा संरक्षण

 


Q3 (a) जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) क्या है? भारत को मेगा जैव विविधता वाला देश क्यों माना जाता है?

उत्तर

जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) वह क्षेत्र होता है जहाँ बहुत अधिक संख्या में पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से कई केवल उसी क्षेत्र में मिलती हैं (स्थानिक प्रजातियाँ)। ऐसे क्षेत्रों में जैव विविधता अत्यधिक होती है, लेकिन मानव गतिविधियों, वनों की कटाई और प्रदूषण के कारण इन पर खतरा भी अधिक होता है।

भारत को मेगा जैव विविधता वाला देश (Mega Biodiversity Country) माना जाता है क्योंकि यहाँ विश्व की लगभग 8% जैव विविधता पाई जाती है। भारत में हिमालय, पश्चिमी घाट, सुंदरबन, मरुस्थल, घने वन, समुद्री तट और द्वीप जैसे विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। भारत में अनेक दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जैसे एशियाई शेर, एक सींग वाला गैंडा और बंगाल टाइगर।

भारत के चार प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं—

  1. हिमालय
  2. पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका
  3. इंडो-बर्मा क्षेत्र
  4. सुंडालैंड (निकोबार द्वीप)

निष्कर्ष: भारत की समृद्ध जैव विविधता का संरक्षण पर्यावरण संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।


Q3 (b) जलीय पारितंत्र (Aquatic Ecosystem) के विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाने वाले जीवन रूपों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

उत्तर

जलीय पारितंत्र वह पारितंत्र है जिसमें जीव जल में रहते हैं। विभिन्न गहराइयों और क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार के जीव पाए जाते हैं।

1. प्लवक (Plankton):
ये जल की सतह पर तैरते हैं। उदाहरण—शैवाल (Algae), डायटम।

2. तैरने वाले जीव (Nekton):
ये सक्रिय रूप से तैर सकते हैं। उदाहरण—मछली, व्हेल, डॉल्फिन।

3. तलवासी जीव (Benthos):
ये जलाशय के तल पर रहते हैं। उदाहरण—केकड़ा, घोंघा, स्टारफिश।

4. जलीय पौधे (Aquatic Plants):
ये जल में या जल की सतह पर उगते हैं। उदाहरण—कमल, जलकुंभी।

Diagram

            जलीय पारितंत्र

      सतह ───────────────
      प्लवक (Plankton)

         🐟 मछली (Nekton)

------------------------------
      तल (Bottom)

  केकड़ा, घोंघा (Benthos)

निष्कर्ष: सभी प्रकार के जलीय जीव मिलकर जलीय पारितंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं।


Q3 (c) सतही जल (Surface Water) और भूजल (Ground Water) में अंतर बताइए तथा जल प्रदूषण के कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर

सतही जल एवं भूजल में अंतर

सतही जल भूजल
नदियों, झीलों और तालाबों में पाया जाता है। भूमि के नीचे चट्टानों एवं मिट्टी में पाया जाता है।
आसानी से दिखाई देता है। दिखाई नहीं देता।
जल्दी प्रदूषित हो जाता है। अपेक्षाकृत कम प्रदूषित होता है।

जल प्रदूषण के प्रमुख कारण

  • औद्योगिक अपशिष्ट का जल में छोड़ा जाना।
  • घरेलू सीवेज और गंदे पानी का नदियों में प्रवाह।
  • कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अधिक उपयोग।
  • प्लास्टिक एवं ठोस कचरे का जल स्रोतों में फेंकना।
  • तेल रिसाव तथा धार्मिक कचरा।

निष्कर्ष: जल प्रदूषण रोकने के लिए अपशिष्ट का उचित प्रबंधन और स्वच्छता आवश्यक है।


Q3 (d) कार्बन चक्र (Carbon Cycle) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए तथा चित्र बनाइए।

उत्तर

कार्बन चक्र वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कार्बन वायुमंडल, पौधों, जीव-जंतुओं, मिट्टी तथा महासागरों के बीच निरंतर घूमता रहता है।

पौधे प्रकाश संश्लेषण के दौरान वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और भोजन बनाते हैं। पशु एवं मनुष्य पौधों या अन्य जीवों को खाकर कार्बन प्राप्त करते हैं। श्वसन, जीवों के अपघटन तथा जीवाश्म ईंधनों के दहन से कार्बन डाइऑक्साइड पुनः वायुमंडल में पहुँच जाती है। इस प्रकार कार्बन का निरंतर चक्र चलता रहता है।

Diagram

         CO₂ (वायुमंडल)
               │
               ▼
     पौधे (प्रकाश संश्लेषण)
               │
               ▼
      पशु एवं मनुष्य
               │
     श्वसन / अपघटन
               │
               ▼
         CO₂ (वायुमंडल)

निष्कर्ष: कार्बन चक्र पृथ्वी पर जीवन और जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


✍️ अच्छे अंक लाने की टिप

हर उत्तर में:

  • मुख्य शीर्षक (Heading) को रेखांकित करें।
  • Diagram पेंसिल से बनाएं।
  • उत्तर के अंत में “निष्कर्ष” लिखें।
  • साफ-सुथरी लिखावट रखें।

बिल्कुल। आगे से मैं ऐसे ही दूँगा जैसे आपको कॉपी में हाथ से लिखना है। आपको सिर्फ देखकर उतारना होगा।


Course Code: BEVAE-181

प्रश्न 4. वन अधिकार अधिनियम, 2006 भारत के जनजातीय एवं वनवासियों की किस प्रकार सहायता करता है? उपयुक्त उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

वन अधिकार अधिनियम, 2006

वन अधिकार अधिनियम, 2006 भारत सरकार द्वारा बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य परंपरागत वनवासियों को उनके पारंपरिक वन अधिकार प्रदान करना तथा उनके जीवन, आजीविका और संस्कृति की रक्षा करना है। लंबे समय तक वनों में रहने वाले लोगों को उनके अधिकार नहीं मिल पाए थे, इसलिए यह कानून बनाया गया।

वन अधिकार अधिनियम से मिलने वाले लाभ

  1. वनवासियों को उस वन भूमि पर कानूनी अधिकार मिलता है, जहाँ वे वर्षों से रह रहे हैं या खेती कर रहे हैं।
  2. उन्हें महुआ, शहद, तेंदूपत्ता, बाँस, लाख, औषधीय पौधे आदि लघु वन उपज एकत्र करने, उपयोग करने और बेचने का अधिकार प्राप्त होता है।
  3. ग्राम सभा को वन संरक्षण, वन संसाधनों के प्रबंधन तथा अधिकारों की पहचान करने का अधिकार दिया गया है।
  4. यह कानून आदिवासियों की संस्कृति, परंपरा और आजीविका की रक्षा करता है।
  5. वन संरक्षण में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ती है, जिससे जंगलों का बेहतर संरक्षण होता है।

उदाहरण

मान लीजिए कोई आदिवासी परिवार पिछले 40 वर्षों से जंगल के पास खेती कर रहा है। पहले उसके पास उस भूमि का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने के बाद उसे उस भूमि पर अधिकार मिल सकता है। इसी प्रकार, वनवासी महिलाएँ महुआ, शहद और बाँस इकट्ठा करके उन्हें बाजार में बेच सकती हैं और अपनी आय बढ़ा सकती हैं।

निष्कर्ष

वन अधिकार अधिनियम, 2006 जनजातीय एवं वनवासियों के अधिकारों की रक्षा करने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है। यह उन्हें भूमि, वन संसाधनों और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। साथ ही, यह पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को भी बढ़ावा देता है।


प्रश्न 5. भारत में गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों की वर्तमान स्थिति का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। उपयुक्त उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधन

गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधन वे ऊर्जा स्रोत हैं जो प्रकृति में बार-बार उपलब्ध होते हैं तथा पर्यावरण को कम नुकसान पहुँचाते हैं। इनमें मुख्य रूप से सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ऊर्जा, जल ऊर्जा और भू-तापीय ऊर्जा शामिल हैं। वर्तमान समय में भारत इन ऊर्जा स्रोतों के विकास पर विशेष ध्यान दे रहा है ताकि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम की जा सके।

भारत आज विश्व के प्रमुख सौर ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल है। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएँ संचालित की जा रही हैं। गाँवों में सोलर स्ट्रीट लाइट, सोलर पंप तथा सोलर रूफटॉप जैसी योजनाओं से लोगों को लाभ मिल रहा है। इससे बिजली की बचत होती है और प्रदूषण भी कम होता है।

हालाँकि, इन ऊर्जा स्रोतों के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर करती हैं तथा इनकी स्थापना की प्रारंभिक लागत अधिक होती है। ऊर्जा भंडारण (Storage) की समस्या भी अभी पूरी तरह हल नहीं हुई है।

उदाहरण

राजस्थान का भड़ला सोलर पार्क (Bhadla Solar Park) विश्व के सबसे बड़े सौर ऊर्जा पार्कों में से एक है। इसके अलावा तमिलनाडु और गुजरात में पवन ऊर्जा का बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाता है।

निष्कर्ष

गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधन भारत के स्वच्छ, सुरक्षित और सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सरकार, उद्योग और नागरिकों के संयुक्त प्रयास से इनका अधिक उपयोग कर ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है।

Course Code: BEVAE-181

प्रश्न 6 (a). पारिस्थितिक नारीवाद (Ecofeminism) की व्याख्या कीजिए।

उत्तर

पारिस्थितिक नारीवाद (Ecofeminism) एक विचारधारा है जो मानती है कि महिलाओं और प्रकृति दोनों का शोषण एक जैसी सामाजिक व्यवस्था के कारण होता है। यह विचारधारा पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं के अधिकारों को समान रूप से महत्व देती है। इसका उद्देश्य प्रकृति का संरक्षण, लैंगिक समानता तथा सतत विकास को बढ़ावा देना है।


प्रश्न 6 (b). भौगोलिक एवं सामाजिक असमानता (Geographical and Social Inequity) की व्याख्या कीजिए।

उत्तर

भौगोलिक एवं सामाजिक असमानता से तात्पर्य संसाधनों, सुविधाओं और अवसरों के असमान वितरण से है। कुछ क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी सुविधाएँ पर्याप्त होती हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में इनकी कमी रहती है। इसी प्रकार समाज के कुछ वर्गों को अधिक अवसर मिलते हैं, जबकि अन्य वर्ग पीछे रह जाते हैं।


प्रश्न 6 (c). ओज़ोन परत का क्षय (Ozone Layer Depletion) क्या है?

उत्तर

ओज़ोन परत का क्षय वह प्रक्रिया है जिसमें वायुमंडल की ओज़ोन परत पतली होने लगती है। इसका मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) जैसी हानिकारक गैसें हैं। ओज़ोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। इसके क्षय से त्वचा कैंसर, आँखों की बीमारियाँ तथा पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।


प्रश्न 6 (d). अम्ल वर्षा (Acid Rain) क्या है?

उत्तर

अम्ल वर्षा (Acid Rain) वह वर्षा है जिसमें सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) गैसों के कारण अम्लीय तत्व मिल जाते हैं। यह वर्षा मिट्टी, जल स्रोतों, फसलों, भवनों तथा ऐतिहासिक स्मारकों को नुकसान पहुँचाती है। अम्ल वर्षा को रोकने के लिए वायु प्रदूषण कम करना तथा स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है।

बिल्कुल। Q7 में चार उप-प्रश्न (a), (b), (c), (d) हैं और प्रत्येक का उत्तर लगभग 150 शब्दों में देना है।


Course Code: BEVAE-181

प्रश्न 7 (a). अनुचित अपशिष्ट निपटान (Improper Waste Disposal) के कोई चार प्रभाव उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

अनुचित अपशिष्ट निपटान से पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं। इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं—

1. जल प्रदूषण: कचरा नदियों और तालाबों में पहुँचकर पानी को प्रदूषित करता है। इससे पीने का पानी दूषित हो जाता है।

2. वायु प्रदूषण: कचरे को खुले में जलाने से जहरीली गैसें निकलती हैं, जिससे श्वसन संबंधी रोग बढ़ते हैं।

3. मृदा प्रदूषण: प्लास्टिक एवं रासायनिक कचरा मिट्टी की उर्वरता को कम कर देता है।

4. बीमारियों का फैलना: गंदगी में मच्छर, मक्खियाँ और अन्य कीट पनपते हैं, जिससे डेंगू, मलेरिया और हैजा जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।

उदाहरण: शहरों में खुले कूड़े के ढेरों से दुर्गंध फैलती है तथा आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्ष: उचित कचरा प्रबंधन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आवश्यक है।


प्रश्न 7 (b). लैंडफिलिंग (Landfilling) अपशिष्ट निपटान की एक महत्वपूर्ण विधि कैसे है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

लैंडफिलिंग ठोस अपशिष्ट के निपटान की एक प्रमुख विधि है। इसमें कचरे को एक निर्धारित स्थान पर डालकर मिट्टी से ढक दिया जाता है। इससे कचरा इधर-उधर नहीं फैलता और दुर्गंध तथा प्रदूषण को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

वैज्ञानिक तरीके से बनाए गए लैंडफिल में लीचेट (गंदा तरल) और गैसों के नियंत्रण की व्यवस्था होती है। कुछ लैंडफिल स्थलों से निकलने वाली मीथेन गैस का उपयोग बिजली उत्पादन में भी किया जाता है।

उदाहरण: भारत के कई बड़े नगरों में नगर निगम द्वारा ठोस कचरे के निपटान के लिए लैंडफिल स्थलों का उपयोग किया जाता है।

निष्कर्ष: यदि लैंडफिल का सही ढंग से प्रबंधन किया जाए तो यह अपशिष्ट निपटान का प्रभावी और उपयोगी तरीका है।


प्रश्न 7 (c). पर्यावरण में प्रदूषण के स्तर की निगरानी करने वाली संस्था के रूप में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board – CPCB) भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाली प्रमुख संस्था है। इसका मुख्य कार्य देश में वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण की निगरानी करना तथा प्रदूषण नियंत्रण के लिए मानक निर्धारित करना है।

CPCB उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले प्रदूषकों की जाँच करता है तथा राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को आवश्यक दिशा-निर्देश देता है। यह पर्यावरण की गुणवत्ता की निगरानी करता है और प्रदूषण कम करने के लिए विभिन्न योजनाएँ एवं जागरूकता कार्यक्रम भी चलाता है।

उदाहरण: CPCB समय-समय पर विभिन्न शहरों की Air Quality Index (AQI) रिपोर्ट जारी करता है, जिससे लोगों को वायु की गुणवत्ता की जानकारी मिलती है।

निष्कर्ष: CPCB पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


प्रश्न 7 (d). पर्यावरणीय समस्याओं एवं चिंताओं के समाधान में सामूहिक कार्य (Collective Actions) किस प्रकार सहायक होते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी आवश्यक है। जब लोग मिलकर किसी पर्यावरणीय समस्या के समाधान के लिए कार्य करते हैं, तो उसे सामूहिक कार्य (Collective Action) कहा जाता है।

सामूहिक प्रयासों के माध्यम से वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, स्वच्छता अभियान तथा कचरे का पृथक्करण जैसे कार्य प्रभावी ढंग से किए जा सकते हैं। विद्यालय, ग्राम पंचायत, स्वयंसेवी संस्थाएँ और स्थानीय समुदाय मिलकर पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

उदाहरण: “स्वच्छ भारत अभियान” और सामूहिक वृक्षारोपण कार्यक्रम ऐसे प्रयास हैं जिनमें लाखों लोगों ने भाग लेकर पर्यावरण सुधार में योगदान दिया।

निष्कर्ष: सामूहिक कार्य से पर्यावरण संरक्षण अधिक प्रभावी बनता है तथा समाज में जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।


बिल्कुल। अब Q8 का उत्तर उसी फॉर्मेट में दे रहा हूँ, जैसा आपको सीधे Assignment Copy में लिखना है।

प्रश्न 8: “आवास (Habitat) का विनाश वैश्विक जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है।” वर्तमान संदर्भ में इस कथन को लगभग 200 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।


Course Code: BEVAE-181

प्रश्न 8. “आवास (Habitat) का विनाश वैश्विक जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है।” वर्तमान संदर्भ में इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

आवास (Habitat) का विनाश

आवास (Habitat) वह प्राकृतिक स्थान है जहाँ जीव-जंतु और पौधे रहते, भोजन प्राप्त करते तथा प्रजनन करते हैं। जब वनों की कटाई, शहरीकरण, औद्योगीकरण, खनन, सड़क निर्माण तथा कृषि के विस्तार के कारण इन प्राकृतिक आवासों का नाश होता है, तो इसे आवास का विनाश कहा जाता है।

आज के समय में आवास का विनाश वैश्विक जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। प्राकृतिक आवास नष्ट होने से अनेक जीव-जंतुओं और पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती हैं। इससे खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और पारिस्थितिक संतुलन भी प्रभावित होता है। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण भी इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।

उदाहरण

भारत में बाघ, एशियाई हाथी, एक सींग वाला गैंडा तथा कई पक्षियों के प्राकृतिक आवास लगातार कम हो रहे हैं। अमेज़न वर्षावनों और पश्चिमी घाट जैसे क्षेत्रों में वनों की कटाई के कारण अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ संकट में हैं।

संरक्षण के उपाय

  • वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जाए।
  • अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए।
  • राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्यों का विस्तार किया जाए।
  • अवैध शिकार पर सख्त रोक लगाई जाए।
  • लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।

निष्कर्ष

आवास का संरक्षण जैव विविधता की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि हम प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखेंगे, तो पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन बना रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जैव विविधता सुरक्षित रह सकेगी।


✍️ कॉपी में लिखते समय

इन Heading को रेखांकित करें:

  • आवास (Habitat) का विनाश
  • उदाहरण
  • संरक्षण के उपाय
  • निष्कर्ष

इस प्रश्न में Diagram आवश्यक नहीं है, क्योंकि प्रश्न में केवल व्याख्या माँगी गई है। लगभग 200–220 शब्द का यह उत्तर IGNOU की अपेक्षित सीमा के अनुरूप है।

 

बिल्कुल। अब Q9 का उत्तर उसी फॉर्मेट में दे रहा हूँ, जैसा आपको सीधे Assignment Copy में लिखना है।

प्रश्न 9: “प्रदूषित जल हमारे स्वास्थ्य तथा सभी जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा है।” जल प्रदूषकों के विभिन्न कारकों के संदर्भ में लगभग 200 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।


Course Code: BEVAE-181

प्रश्न 9. “प्रदूषित जल हमारे स्वास्थ्य तथा सभी जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा है।” जल प्रदूषकों के विभिन्न कारकों के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

प्रदूषित जल और उसका प्रभाव

जल जीवन का आधार है, लेकिन जब इसमें हानिकारक पदार्थ, रसायन, जीवाणु या विषैले तत्व मिल जाते हैं, तो वह प्रदूषित जल कहलाता है। प्रदूषित जल मनुष्य, पशु-पक्षियों, जलीय जीवों तथा पौधों के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। इसके कारण अनेक बीमारियाँ फैलती हैं और पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ता है।

जल प्रदूषकों के प्रमुख कारक

  1. घरेलू अपशिष्ट: घरों का गंदा पानी, साबुन, डिटर्जेंट तथा सीवेज नदियों और तालाबों में मिलकर जल को प्रदूषित करते हैं।
  2. औद्योगिक अपशिष्ट: कारखानों से निकलने वाले रसायन, भारी धातुएँ तथा विषैले पदार्थ जल स्रोतों को दूषित कर देते हैं।
  3. कृषि रसायन: उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग वर्षा के पानी के साथ नदियों और झीलों में पहुँच जाता है।
  4. प्लास्टिक एवं ठोस कचरा: प्लास्टिक, बोतलें और अन्य कचरा जल स्रोतों में जमा होकर जल गुणवत्ता को खराब करते हैं।

उदाहरण

कई नदियों में बिना शोधन (Treatment) के सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट छोड़े जाने के कारण जल प्रदूषण बढ़ रहा है, जिससे जलीय जीवों की मृत्यु और लोगों में हैजा, टाइफाइड तथा डायरिया जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।

निष्कर्ष

जल प्रदूषण को रोकने के लिए अपशिष्ट जल का शोधन, प्लास्टिक का कम उपयोग, औद्योगिक अपशिष्ट का उचित निपटान तथा जन-जागरूकता आवश्यक है। स्वच्छ जल की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।


✍️ कॉपी में ऐसे लिखें

इन Heading को रेखांकित करें:

  • प्रदूषित जल और उसका प्रभाव
  • जल प्रदूषकों के प्रमुख कारक
  • उदाहरण
  • निष्कर्ष

📌 इस प्रश्न में Diagram आवश्यक नहीं है, क्योंकि IGNOU ने केवल व्याख्या माँगी है। लगभग 200 शब्दों का यह उत्तर असाइनमेंट के लिए उपयुक्त है।

 

Course Code: BEVAE-181

प्रश्न 10. “प्राकृतिक आपदाओं में मरने वालों और प्रभावित होने वालों का अनुपात आपदा के प्रकार, तैयारी के स्तर तथा जनसंख्या घनत्व पर निर्भर करता है।” इस कथन को उपयुक्त तर्क एवं उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

प्राकृतिक आपदाएँ और उनका प्रभाव

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकंप, बाढ़, चक्रवात, सूखा, भूस्खलन और सुनामी मानव जीवन, संपत्ति तथा पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाती हैं। किसी आपदा में कितने लोगों की मृत्यु होगी और कितने लोग प्रभावित होंगे, यह केवल आपदा की तीव्रता पर ही नहीं, बल्कि आपदा के प्रकार, तैयारी के स्तर तथा जनसंख्या घनत्व पर भी निर्भर करता है।

1. आपदा का प्रकार

हर प्राकृतिक आपदा का प्रभाव अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए, भूकंप अचानक आता है, जिससे लोगों को बचने का समय कम मिलता है। वहीं बाढ़ या चक्रवात की पहले से चेतावनी मिलने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा सकता है।

2. तैयारी का स्तर

यदि किसी क्षेत्र में पूर्व चेतावनी प्रणाली, राहत दल, सुरक्षित आश्रय स्थल और बचाव की उचित व्यवस्था हो, तो जनहानि काफी कम हो जाती है। आपदा प्रबंधन की अच्छी व्यवस्था लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

3. जनसंख्या घनत्व

घनी आबादी वाले क्षेत्रों में आपदा का प्रभाव अधिक होता है, क्योंकि कम क्षेत्र में अधिक लोग रहते हैं। इसके विपरीत कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में जनहानि अपेक्षाकृत कम होती है।

उदाहरण

ओडिशा में चक्रवात आने से पहले सरकार द्वारा समय पर चेतावनी, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने और राहत शिविरों की व्यवस्था करने के कारण पिछले वर्षों में जनहानि में उल्लेखनीय कमी आई है। इसके विपरीत, बिना तैयारी वाले क्षेत्रों में छोटी आपदाएँ भी बड़े नुकसान का कारण बन जाती हैं।

निष्कर्ष

प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली क्षति को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय पर चेतावनी, प्रभावी आपदा प्रबंधन, जन-जागरूकता, मजबूत आधारभूत संरचना तथा उचित योजना के माध्यम से जनहानि और आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसलिए प्रत्येक नागरिक और सरकार को आपदा के प्रति हमेशा तैयार रहना चाहिए।

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